जीएसआई की रिपोर्ट के अनुसार, उत्तराखंड का 22% हिस्सा भूस्खलन के उच्च जोखिम क्षेत्र में है। रिपोर्ट में कारणों, आंकड़ों और बचाव के उपायों का विश्लेषण किया गया है।
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उत्तराखंड में भूस्खलन का खतरा: जीएसआई रिपोर्ट और विश्लेषण
भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (जीएसआई) की एक हालिया रिपोर्ट में उत्तराखंड के पहाड़ों में बढ़ते भूस्खलन के खतरे पर गंभीर चिंता जताई गई है। रिपोर्ट के अनुसार, राज्य का लगभग 22% हिस्सा उच्च भूस्खलन क्षेत्र में आता है, जिससे यहाँ रहने वाले लाखों लोगों की जान को खतरा है। चमोली, रुद्रप्रयाग, टिहरी और उत्तरकाशी जैसे जिलों में विशेष रूप से खतरा है, जहाँ लगभग 15 लाख लोग रहते हैं।
भूस्खलन के कारण
जीएसआई की रिपोर्ट में भूस्खलन के कई कारणों की पहचान की गई है:
- कमजोर चट्टानें: पहाड़ों की चट्टानें कमजोर और टूटी हुई हैं, जिससे वे आसानी से खिसक जाती हैं।
- अत्यधिक वर्षा: भारी बारिश के कारण मिट्टी में पानी भर जाता है, जिससे वह फिसलने लगती है। बादल फटने की घटनाएं भी ढलानों को तोड़ देती हैं।
- सड़क निर्माण: सड़क बनाने के लिए पहाड़ों को सीधा काटने से ढलान अस्थिर हो जाते हैं।
- नदियों का कटाव: नदियां नीचे से किनारों को काटती हैं, जिससे ऊपर की जमीन ढह जाती है।
- मानवजनित कारण: निर्माण का मलबा ढलानों पर फेंकने से वजन बढ़ता है और पानी का रास्ता अवरुद्ध हो जाता है। वनों की कटाई से पेड़ों की जड़ें नष्ट हो जाती हैं, जिससे मिट्टी की पकड़ कमजोर हो जाती है।
- भूकंप: बार-बार आने वाले छोटे भूकंपों से भी ढलान ढीली पड़ जाती है।
- जलवायु परिवर्तन: जलवायु परिवर्तन के कारण अत्यधिक बारिश और बर्फबारी की घटनाएं बढ़ रही हैं, जिससे भूस्खलन का खतरा और बढ़ गया है।
आंकड़े और नुकसान
पिछले कुछ वर्षों में उत्तराखंड में भूस्खलन की घटनाओं में वृद्धि हुई है। जीएसआई ने 91,000 भूस्खलनों का डेटा जुटाया है, जो राज्य की नाजुक स्थिति को दर्शाता है। पिछले पांच वर्षों के आंकड़े इस प्रकार हैं:
| वर्ष | घटनाएं | मौतें | क्षतिग्रस्त घर | आंशिक क्षतिग्रस्त घर |
|---|---|---|---|---|
| 2020 | 350 | 31 | 245 | 800 |
| 2021 | 354 | 79 | 310 | 950 |
| 2022 | 245 | 39 | 220 | 680 |
| 2023 | 1,100+ | 48 | 730+ | 2,100+ |
| 2024 | 1,300+ | 54+ | 810+ | 2,240+ |
इस मानसून सीजन में 120 से अधिक लोगों की मौत हुई है और 150 लोग लापता हैं। राज्य को 3,000 करोड़ रुपये से अधिक का नुकसान हुआ है और 5,000 से अधिक घर क्षतिग्रस्त हो चुके हैं।
बचाव के उपाय
रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान कर उन्हें जोनिंग नियमों के तहत विकसित किया जाए और ढलानों को स्थिर बनाने के उपाय किए जाएं। इसके अतिरिक्त, विकास योजनाओं का वैज्ञानिक आकलन करना भी आवश्यक है।
- संवेदनशील क्षेत्रों में निर्माण गतिविधियों को नियंत्रित किया जाना चाहिए।
- ढलानों को स्थिर करने के लिए भू-तकनीकी उपाय, जैसे कि मिट्टी का स्थिरीकरण और चट्टान बोल्टिंग, किए जाने चाहिए।
- वनों की कटाई को रोका जाना चाहिए और अधिक पेड़ लगाए जाने चाहिए।
- जल निकासी व्यवस्था में सुधार किया जाना चाहिए ताकि बारिश का पानी ढलानों को नुकसान न पहुंचाए।
- लोगों को भूस्खलन के खतरे के बारे में जागरूक किया जाना चाहिए।
केदारनाथ मार्ग पर खतरा
केदारनाथ धाम तक का सफर भी अब बेहद खतरनाक हो गया है। रुद्रप्रयाग जिले में हाईवे पर 51 डेंजर जोन बन चुके हैं, जिनमें से 13 इस साल मानसून में बने हैं।
निष्कर्ष
उत्तराखंड में भूस्खलन एक गंभीर समस्या है, जिसके लिए तत्काल ध्यान देने की आवश्यकता है। जीएसआई की रिपोर्ट में दिए गए सुझावों को लागू करके और उचित बचाव उपाय करके, राज्य में भूस्खलन के खतरे को कम किया जा सकता है। विकास योजनाओं को वैज्ञानिक तरीके से लागू करने और पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता बरतने से ही इस आपदा से बचा जा सकता है।
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