उत्तराखंड की पौड़ी रामलीला: यूनेस्को भी है इसका दीवाना, जानिए क्यों?

उत्तराखंड की पौड़ी रामलीला, जो अपनी अनूठी परंपराओं और गढ़वाली भाषा के प्रयोग के लिए जानी जाती है, यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल है। जानिए इस रामलीला की खासियतें।

उत्तराखंड की पौड़ी रामलीला: यूनेस्को भी है इसका दीवाना, जानिए क्यों?

उत्तराखंड की पौड़ी रामलीला एक अनूठी सांस्कृतिक धरोहर है, जिसे यूनेस्को ने भी सराहा है। इस रामलीला की खासियत यह है कि इसमें चौपाइयां ठेठ पहाड़ी भाषा में गाई जाती हैं। 125 साल से भी अधिक पुरानी यह रामलीला पौड़ी गढ़वाल में आयोजित की जाती है और यह उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।

पौड़ी रामलीला का इतिहास

पौड़ी की रामलीला 1897 में कांडई गांव में शुरू हुई थी। 1908 में इसे भव्य रूप दिया गया। शुरुआत में, यह रामलीला नौटंकी शैली में होती थी, जिसमें कलाकार गाते-गाते अपनी कहानी कहते थे। बाद में, पारसी थिएटर के प्रभाव में, रामलीला ने अपना स्वरूप बदल लिया। 1957 में पौड़ी में पहली बार बिजली आने के बाद, रामलीला का मंच रोशनी से जगमगा उठा।

भाषा और संगीत

पौड़ी रामलीला की सबसे बड़ी खासियत इसकी भाषा और संगीत है। इसमें हिंदी, उर्दू, संस्कृत और ब्रज भाषा के शब्दों का प्रयोग किया जाता है, लेकिन चौपाइयां गढ़वाली भाषा में गाई जाती हैं। रामलीला के संगीत को बागेश्री, मालकोस और जौनपुरी जैसे मशहूर रागों पर तैयार किया गया है।

सांस्कृतिक सौहार्द

पौड़ी की रामलीला सांस्कृतिक सौहार्द का प्रतीक है। इसमें हिंदू, मुस्लिम और ईसाई समुदाय के लोग भी सालों से हिस्सा लेते आए हैं। यह रामलीला सभी धर्मों के लोगों को एक साथ लाने का काम करती है।

महिला पात्रों की भागीदारी

पौड़ी की रामलीला उत्तराखंड की पहली ऐसी रामलीला है, जिसने 2002 में महिला पात्रों को भी मंचन में शामिल किया। इस रामलीला में महिलाओं के किरदार महिलाएं ही निभाती हैं। यह परंपरा आज भी जारी है और समाज में महिलाओं की भागीदारी का एक सशक्त उदाहरण पेश करती है।

यूनेस्को की मान्यता

पौड़ी रामलीला की इन्हीं विशेषताओं के कारण इसे यूनेस्को ने 2008 में विश्व की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर के रूप में मान्यता दी। यह उत्तराखंड के लिए गर्व की बात है कि उसकी एक सांस्कृतिक विरासत को वैश्विक स्तर पर पहचान मिली है।

निष्कर्ष

उत्तराखंड की पौड़ी रामलीला एक अनूठी और महत्वपूर्ण सांस्कृतिक धरोहर है। यह न केवल राम कथा का मंचन करती है, बल्कि यह गढ़वाली भाषा, संगीत और सांस्कृतिक सौहार्द का भी प्रतीक है। यूनेस्को की मान्यता ने इस रामलीला को और भी महत्वपूर्ण बना दिया है।

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