चमोली: भूस्खलन और भूधंसाव से कई हेक्टेयर जंगल नष्ट, रैणी आपदा में भी ऋषि गंगा के बहाव से बह गया था बड़ा हिस्सा

चमोली जनपद में भूस्खलन और भूधंसाव के कारण भारी मात्रा में वन संपदा का नुकसान हुआ है, खासकर नंदा नगर क्षेत्र में।

चमोली जनपद में भूस्खलन और भूधंसाव के कारण बड़ी मात्रा में जंगलों को नुकसान पहुंचा है। नंदानगर क्षेत्र में सबसे अधिक क्षति हुई है। जिस बिनसर पहाड़ी से धुर्मा और कुंतरी गांव में बादल फटने के बाद मलबा गांवों तक पहुंचा, उसमें कई हेक्टेयर वन संपदा भी नष्ट हो गई है। नंदानगर के मोक्ष गदेरे के बहाव में भी काफी नुकसान हुआ है। गदेरे का जलस्तर कम होने पर यहां कई पेड़ों के अवशेष पड़े दिख रहे हैं।

भूस्खलन और भूधंसाव का प्रभाव

भूस्खलन (Landslide) और भूधंसाव (Subsidence) एक गंभीर पर्यावरणीय समस्या है, जो पहाड़ी क्षेत्रों में अक्सर देखने को मिलती है। भूस्खलन में मिट्टी और चट्टानों का एक बड़ा हिस्सा गुरुत्वाकर्षण के कारण नीचे खिसक जाता है, जबकि भूधंसाव में भूमि की सतह धीरे-धीरे नीचे धंस जाती है। इन दोनों घटनाओं का मुख्य कारण प्राकृतिक और मानवजनित कारक होते हैं, जैसे कि भारी वर्षा, वनों की कटाई, और अनियोजित निर्माण। चमोली जिले में इन घटनाओं के कारण वन संपदा को भारी नुकसान हुआ है, जिससे पारिस्थितिक तंत्र पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा है।

रैणी आपदा और ऋषि गंगा का प्रभाव

चमोली में 2021 में घटित रैणी आपदा में ऋषि गंगा के बहाव में कई हेक्टेयर हिस्से में पेड़ टूटकर बह गए थे। रैणी आपदा 7 फरवरी, 2021 को उत्तराखंड के चमोली जिले में आई एक बड़ी प्राकृतिक आपदा थी। इस आपदा में ऋषिगंगा नदी में अचानक आई बाढ़ के कारण तपोवन विष्णुगाड जलविद्युत परियोजना को भारी नुकसान हुआ था और कई लोगों की जान चली गई थी।

वन क्षेत्र की सुरक्षा के उपाय

अभी तक भी यहां वन क्षेत्र की सुरक्षा के कोई उपाय नहीं किए गए हैं। केदारनाथ वन्यजीव प्रभाग के डीएफओ सर्वेश दुबे ने बताया कि आपदा में जंगलों को हुए नुकसान के आंकड़ों को जुटाया जा रहा है। वन क्षेत्र की सुरक्षा के लिए सरकार और स्थानीय समुदाय दोनों को मिलकर काम करने की आवश्यकता है।

उत्तराखंड में वन संपदा का महत्व

उत्तराखंड में वन संपदा का बहुत महत्व है। राज्य के लगभग 65% भाग पर वन हैं, जो इसे जैव विविधता का हॉटस्पॉट बनाते हैं। यहां विभिन्न प्रकार के पेड़, पौधे, और जीव-जंतु पाए जाते हैं, जो राज्य के पारिस्थितिक तंत्र को संतुलित रखते हैं। वन न केवल वन्यजीवों के लिए आवास प्रदान करते हैं, बल्कि स्थानीय लोगों की आजीविका का भी एक महत्वपूर्ण स्रोत हैं।

पर्यावरण संरक्षण के लिए आवश्यक कदम

पर्यावरण संरक्षण के लिए निम्नलिखित कदम उठाए जा सकते हैं:

  • वनों की कटाई को रोकना
  • अधिक से अधिक पेड़ लगाना
  • भूस्खलन और भूधंसाव को रोकने के लिए उपाय करना
  • पर्यावरण के अनुकूल विकास को बढ़ावा देना

इन कदमों के माध्यम से हम न केवल अपनी वन संपदा को बचा सकते हैं, बल्कि एक स्वस्थ और टिकाऊ भविष्य का निर्माण भी कर सकते हैं।

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