दीयों में रोशनी नहीं, उम्मीद की लौ है: कुम्हार मंडी और सहस्त्रधारा की दीपावली

देहरादून की कुम्हार मंडी में दीयों की रौनक के पीछे मिट्टी की महंगाई की चिंता है, वहीं सहस्त्रधारा का आपदाग्रस्त इलाका आत्मनिर्भर महिलाओं की मोमबत्तियों से रोशन हो रहा है।

दीपों का त्योहार है, लेकिन हर चमक के पीछे एक कहानी छुपी है। देहरादून की कुम्हार मंडी में इस बार दीयों की रौशनी से ज़्यादा चर्चा है मिट्टी की महंगाई की। दूसरी ओर, सहस्त्रधारा का आपदाग्रस्त इलाका इस बार उम्मीद की लौ से जगमगाने वाला है—जहां आपदा से जूझ रहीं महिलाएं अब आत्मनिर्भरता की मिसाल बनकर, अपने हाथों से बनी मोमबत्तियों से पूरे शहर को रोशन करने निकली हैं। दीपावली, वो पर्व जो अंधकार पर प्रकाश की विजय का प्रतीक है। घर-आँगन में दीप जलते हैं, दिलों में उम्मीदें, लेकिन इस बार देहरादून की रोशनी कुछ अलग है, क्योंकि इन दीयों और मोमबत्तियों के पीछे सिर्फ घी या मोम नहीं, बल्कि पसीना, संघर्ष और उम्मीद भी लौ जल रही है।

देहरादून की प्रसिद्ध कुम्हार मंडी में दीपावली की चहल-पहल जोरों पर है। हर साल की तरह इस बार भी मिट्टी से बने दीयों, मूर्तियों और सजावटी सामानों की भरमार है। खरीदार आ रहे हैं, खरीदारी हो रही है, बच्चों के चेहरे चमक रहे हैं, लेकिन दुकानों के पीछे खड़े कुम्हारों की आँखों में एक अनकही सी थकान है। उनका दर्द बस इतना है कि मिट्टी महंगी हो गई है, और कमाई कम। पहले जहाँ 500 रुपये में एक ट्रॉली मिट्टी आ जाती थी, अब 1200 से नीचे नहीं आती। बाजार तो सजा है, लेकिन मुनाफा नहीं, सरकार से कोई सीधी मदद नहीं।

उधर सहस्त्रधारा के आपदा प्रभावित इलाके में बीते महीने आई प्राकृतिक आपदा ने इस क्षेत्र को बुरी तरह झकझोर दिया था, घर उजड़े, जीवन ठहरा, लेकिन हौसले नहीं टूटे। दगड़ियो ग्राम पंचायत धनौला, न्याय पंचायत सरोना की कुछ साधारण महिलाएं, अब असाधारण काम कर रही हैं। स्वयं सहायता समूह से जुड़ी ये महिलाएं अब अपने हाथों से आकर्षक मोमबत्तियाँ और सजावटी सामान तैयार कर रही हैं और कहती हैं कि हम चाहते हैं कि इस बार देहरादून हमारे बनाए दीपों से रोशन हो। वे सिर्फ मोमबत्तियाँ नहीं बना रहीं, अपना भविष्य गढ़ रही हैं। उनके लिए ये दिवाली सिर्फ रोशनी का नहीं, आत्मनिर्भरता का प्रतीक बन गई है।

कुम्हारों की परेशानी हो या महिलाओं के सपनों को उड़ान देने की बात—दोनों ही जगह सरकारी योजनाएँ तो हैं, लेकिन क्रियान्वयन उतना प्रभावी नहीं, कुम्हार मंडी के कारीगरों को मिट्टी पर सब्सिडी या आसान परिवहन सुविधा नहीं मिलती। वहीं, स्वयं सहायता समूहों को मशीन, मार्केटिंग और प्रशिक्षण में अब भी सरकारी मदद की दरकार है। खुशी की बात ये है कि देहरादून का समाज भी बदल रहा है। लोग अब बाजार में मॉल की बनी झालरें नहीं, स्थानीय लोगों द्वारा बनाए दीये और मोमबत्तियाँ खरीद रहे हैं। सोशल मीडिया पर चल रहे कैंपेन “लोकल के लिए रोशनी” ने भी खासा ध्यान खींचा है। स्कूलों में बच्चों को सिखाया जा रहा है कि मिट्टी के दीये क्यों ज़रूरी हैं, और कैसे “वोकल फॉर लोकल” का असली मतलब समझें।

Subscribe to Our Newsletter

Keep in touch with our news & exclusive articles

Thank you for subscribing to the newsletter.

Oops. Something went wrong. Please try again later.

Share the post
What to read next...

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.